गंगा पूजन, स्नान और ध्यान से समस्त पापों को नाश, गंगा दशहरा 20 जून को


दस प्रकार के पापों का तिरोहण होता है गंगादशहरा 

गंगा दशहरा के दिन गंगा पूजन, स्नान और ध्यान से समस्त पापों को नाश 

समस्त पापों को नाश करता है गंगा दशहरा

 -आचार्य पं शरदचन्द मिश्र, 
वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार 20 जून, रविवार को सूर्योदय  5 बजकर 13 मिनट पर और ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का मान दोपहर 12 बजकर 2 मिनट पश्चात एकादशी, चित्रा नक्षत्र दिन में 3 बजकर 27 मिनट और पद्म नामक महा औदायिक योग भी है। मध्याह्न मे व्याप्त दशमी होने से गंगादशहरा व्रत के लिए यह दिन पूर्ण मान्य और प्रशस्त रहेगा। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है। पुराणो  की मान्यता के अनुसार इसी दिन गंगा जी का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सर का मुख मानी जाती है। इस दिन गंगा नदी मे स्नान, दान और उपवास का बहुत महत्व है। यदि गंगा नदी तक नही जा सकते है तो घर पर ही गंगा जल डालकर स्नान करने और अर्चन से भी पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। ब्रह्मपुराण मे कहा गया है कि हस्त नक्षत्र से संयुक्त शुक्ला दशमी दस प्रकार के पापों को हरने के कारण दशहरा कहलाती है। ये दस पाप हैं-तीन कायिक-बिना अनुमति के दूसरे की वस्तु लेना,-हिंसा-परस्त्रीगमन। चार वाचिक--कटु बोलना, झूठ बोलना, पीछे से बुराई या चुगली करना, निष्प्रयोजन बातें करना। तीन मानसिक--दूसरे की वस्तु को अन्याय पूर्वक लेने का विचार करना, दूसरे के अनिष्ट का चिन्तन करना और नास्तिक बुद्धि रखना। 

स्कन्दपुराण में कहा गया है कि "ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः। व्यतीपाते गरानन्दे कन्या चन्द्रे वृषे रवौ। दशयोगे नरः स्नानात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।।" अर्थात ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को बुधवार हो, हस्त नक्षत्र हो, व्यतिपात योग हो, गर करण हो, आनन्द नाम औदायिक योग हो, सूर्य वृषभ राशि तथा चन्द्रमा कन्या राशि मे हो तो ऐसा अभूतपूर्व योग महाफलदायक होता है। जिसमें व्यक्ति के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं।

व्रत करने की विधि
प्रातःकाल उठकर सामान्य तौर पर स्नान कर इस पर्व के लिए संकल्प करे-"अमुक गोत्र अमुक नामाहं मम दशविध पापक्षयार्थं गंगादशहरा निमित्तकं अमुक तीर्थे वा गृहे स्नानं करिष्ये।"-यदि गंगा जी न उपलब्ध हो तो किसी भी पुण्यसलिला नदी में और इनकी भी उपलब्धि न हो हो तो घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करें।तदुपरान्त गंगा जी का पूजन करना चाहिए।यदि नदी मे स्नान कर रहे है तो दस गोते लगाएं।सूखे वस्त्र पहनकर पितृतर्पण करे।पुनः दस मुट्ठी कालातिल अंजलि में लेकर नदी मे प्रवाहित करे।घर पर हैं तो दान करें।इसी तरह गुड़ और सत्तू को प्रवाहित करे या दान करे।पश्चात गंगा जी की पूजा निम्न मन्त्र से करें--"नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै।शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नन्दिन्यै ते नमः।।"पुनः अपने दशविध पापों  के प्रमशन के लिए गंगा जी की प्रार्थना करें व पूजा के अनन्तर दीपदान भी करें।
यदि सम्भव हो तो उक्त मन्त्र में  नमः के स्थान पर स्वाहा लगाकर हवन भी करें।तत्पश्चात -"नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं हिलि-हिलि मिलि-मिलि गंगे मां पावय-पावय स्वाहा"-इस मन्त्र से पाॅच पुष्पांजलि अर्पण करके गंगा जी को पृथ्वी पर अवतरित करने वाले भगीरथ जी का तथा हिमालय का पूजन करना चाहिए।अन्त मे दस-दस मुट्ठी अनाज ब्राह्मणों को अर्पित करना चाहिए।इस दिन सत्तू का भी दान किया जाता है।साथ ही गंगा दशहरा की कथा सुनकर ही  व्रत खोलना चाहिए।

गंगा दशहरा की कथा
अयोध्या के राजा महाराज सगर अपने साठ हजार पुत्रो की उद्दण्डता एवं दुष्ट प्रकृति से दुःखी थे।फलतः अपने पुत्र असमंजस अथवा अन्य पुत्रो के स्थान पर अपने पौत्र अंशुमान को अपना उत्तराधिकारी बनाया।जब महाराज सगर ने यज्ञ किया तब इन्द्र ने अश्वमेध के घोड़े को पाताल लोक में ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बाॅध दिया।कपिल मुनि उस समय ध्यानमग्न थे।उन्हें इस बात का पता ही नही चला कि महाराज सगर का अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा उनके आश्रम में बंधा हुआ है।जब सगर के साठ हजार पुत्रो को इसका पता चला कि कपिल के आश्रम मे घोड़ा बंधा हुआ है तो वे कपिल मुनि को मारने के लिए गये। कपिल मुनि ने अपने तेज से सगर के साठ हजार पुत्रों को भष्म कर दिया।अंशुमान को जब इस बात का पता चला तो,उसने कपिल मुनि से प्रार्थना की।अंशुमान की प्रार्थना से प्रसन्न होकर कपिल मुनि ने यज्ञ कि घोड़ा वापस कर दिया तथा कहा कि गंगाजल के स्पर्श से सगर के साठ हजार पुत्रों की मुक्ति हो सकती है।महाराजा सगर का अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हुआ।कुछ समय पश्चात सगर ने अंशुमान को राज्यपद दे दिया,किन्तु अंशुमान अपने चाचाओं की मुक्तिक के लिए चिन्तित थे।इसलिए कूछ समय पश्चात अपने राज्य को अपने पुत्र दिलीप को सौपकर पृथ्वी पर गंगा जी को लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए वन में चला गया।तपस्या करते हुए उसने प्राण त्याग दिये ,किन्तु पृथ्वी पर गंगा का अवतरण न हो पाया।कालान्तर मे दिलीप अपने पुत्र भगीरथ को राजगद्दी सौपकर पृथ्वी पर गंगा जी को लाने के लिए तपस्या करने के लिए चल दिये।उन्होंने मृत्युपर्यन्त तपस्या की ,किन्तु पृथ्वी पर गंगा का अवतरण न हो सका।

राजा दिलीप के पश्चात राजा बने भगीरथ ने भी अपने पिता की भाॅति स्वर्ग से गंगा लाने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या की।अन्त में तीन पीढ़ियों की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने भगीरथ को दर्शन दिया और वर मांगने के लिए कहा।भगीरथ ने पृथ्वी पर गंगा जी के अवतरण की बात की।इस पर ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर भेज तो सकता हूॅ,किन्तु पथ्वी पर उनके वेग को कौन सम्भालेगा?इसके लिए तुम्हे भगवान शिव की उपासना करनी चाहिए।" ब्रह्मा जी के परामर्श के अनुसार भगीरथ ने एक पैर पर खड़े होकर शिव की तपस्या की।भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव गंगा जी के वेग को सम्भालने के लिऐ तैयाय हो गये। तब पृथ्वी पर गंगा जी का अवतरण हुआ।। भगवान शिव ने गंगा को अपने जटाओं में रोक लिया और उसमे से एक जटा को पृथ्वी पर छोड़ दिया।इस प्रकार गंगा जी पृथ्वी पर आयीं।फिर आगे-आगे राजा भगीरथ पीछे-पीछे ग॔गा जी थीं।वह कपिल मुनि के आश्रम मे पहुॅची और सगर के साठ हजार पुत्रो को मुक्ति प्राप्त हुई।

-आचार्य पं शरदचन्द मिश्र (अध्यक्ष-रीलीजीयस स्कालर्स वेलफेयर सोसाइटी)

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