ये दो तिथियां एक साथ पड़ने से इस साल 8 दिन के होंगे शारदीय नवरात्रि, जानिए तिथियां और घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि यानी मां दुर्गा की उपासना का पावन पर्व। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल शारदीय नवरात्रि 7 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं और 15 अक्टूबर को विजया दशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। 

आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, मां दुर्गा के सभी नौ दिनों को बेहद शुभ माना गया है। इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार से हो रही है। ऐसे में मां दुर्गा डोली (पालकी) पर सवार पर होकर आएंगी।

गोरखपुर। नवरात्र के प्रथम दिन प्रतिपदा तिथि दिन में 3 बजकर 28 मिनट तक होने से कलश स्थापन के लिए पर्याप्त समय है। इसके लिए प्रतिपदा तिथि ग्राह्य है परन्तु उसमें भी अभिजित मुहुर्त को अत्यन्त प्रशस्त माना गया है। यह दिन मे 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक (7 अक्टूबर को) रहेगा।

इस वर्ष शारदीय नवरात्र केवल आठ दिनो का ही रहेगा। यह 7 अक्टूबर, बृहस्पति से आरम्भ होकर 14 अक्टूबर 2021, गुरूवार को ही नवरात्र का समापन होगा। यह शारदीय नवरात्र शुभ दिन से आरम्भ होने से समस्त जनों के लिए यह शुभद ही रहेगा।

वाराणसी से प्रकाशित पञ्चाङ्ग के अनुसार इस वर्ष षष्ठी तिथि का क्षय होने से नवरात्र आठ ही दिन का रहेगा। माता दुर्गा जी के नवरात्र के विषय में दो मत है। एक मत के अनुसार माता का आगमन प्रतिपदा को होता और इसी दिन के आधार पर देवी के आगमन का विचार किया जाय। वही द्वितीय मत के विद्वानों का कथन है कि माता का सप्तमी तिथि को आगमन होता है। सप्तमी तिथि को आगमन और गमन दशमी तिथि को होता है। दशमी तिथि के गमन की बात तो दोनो मत वाले मानते है परन्तु आगमन के विषय में मतैक्यता का अभाव है।वाराणसी के पंचांगकार सप्तमी को ही मानते है। इस आधार पर सप्तमी तिथि को मंगलवार होने से देवी का आगमन तुरंग (घोड़े) पर हो रहा है। जो सामान्य फलदायक सै परन्तु दशमी शुक्रवार होने से प्रस्थान (गमन) हाथी पर हो रहा है जो शुभफलदायक रहेगा। इससे समस्त व्यक्तियों में नई स्फूर्ति, नव चेतना और समृद्धि के उन्नयन का योग प्राप्त होगा।

"एकभुक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च। पूजनीया जनैर्देवी स्थाने-स्थाने पुरे-पुरे।।"-एक समय भोजन करके या रात्रि में भोजन करके अथवा बिना मांगे जो मिल जाय, उसी को प्राप्त करके जगज्जननी भगवती दुर्गा की पूजा, ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इत्यादि को प्रसन्नतापूवक भक्तिभाव के साथ प्रत्येक ग्राम, नगर, घर और वन या एकान्त मे करनी चाहिए। शास्त्र विधि के अनुसार सविधि पूजा करने में असमर्थ व्यक्ति गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य इत्यादि से पञ्चोपचार पूजा करे। यदि पञ्चोपचार से भी सम्भव न हो तो केवल पुष्प और जल से ही पूजा करे। पुष्प और जल के अभाव में केवल भक्तिभाव (हाथ जोड़कर) से ही देवीपूजा करे। भविष्य पुराण में इसके विषय में कहा गया है कि वस्तुओ के अभाव मे मनसोपचार पूजा ही सम्पन्न कर ले।

भविष्य पुराण का कथन है कि नवरात्र वृद्धि और ह्रास के क्रम से उसकी शुभता पर कोई प्रभाव नही पड़ता है।-

"तिथिवृद्धौ तिथिह़्रासे नवरात्रमपार्थकम।

अष्टरात्रौ न दोषोऽयं नवरात्र तिथि क्षये।।"

वर्ष में कुल चार नवरात्र माने जाते है। वर्गीकरण में दो प्रत्यक्ष और दो गुप्त कहे जाते है। प्रत्यक्ष नवरात्र आश्विन और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में होते है। इसी प्रकार गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष मे परिगणित है। प्रत्यक्ष नवरात्र में घर पर देवी के उपासना का सर्वाधिक महत्व है। इसी प्रकार गुप्त नवरात्रो का महत्व शक्तिपीठो पर है। तन्त्र वाराही मे तो वर्ष के समस्त दिनो को परिगणित कर 40 नवरात्र कहे गये है। अर्थात वर्ष के समस्त दिवस देवी की उपासना के पूर्ण प्रशस्त है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक जो दुर्गा जी का प्रसिद्ध पर्वकाल है, उसे शारदीय नवरात्र कहते है। यह पूजा परम फलदायिनी है। इसमें नौ दिनो तक नवरात्र व्रत किया जाता है।नवरात्र व्रय करने वालों को केवल एक समय भोजन करना होता है।नवरात्र व्रत जो नही कर सकते है, वे यदि सप्तमी, अष्टमी और नवमी-इन तीन तिथियों में उपवास करे, तो उनकी कामना सिद्ध होती है। 

तिथि दो प्रकार की होती है। सम्पूर्णा और खण्डा। पहले दिन के सूर्योदय से आरम्भ कर दूसरे दिन सूर्योदय पर्यन्त जो तिथि रहे, उसे पूर्णा तिथि कहते है। सूर्योदय से आरम्भ कर सूर्यास्त पर्यन्त रहने वाली तिथि दिन के काम के लिए वह भी पूर्णा ही मानी जाती है। यदि कोई तिथि सूर्योदय से आरम्भ कर मध्याह्न पर्यन्त रहे, तो वह भी पूर्णा ही मानी जाती है। इससे भिन्न तिथि खण्डा कही जाती है। धर्मशास्त्र मे कहा है कि जिस तिथि मे सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा हो, उसी दिन से ही नवरात्र का आरम्भ माना जाय। 

नन्दिकेश्वर का कथन है कि जगज्जननी भगवती दुर्गा का आवाहन, विसर्जन आदि समस्त कार्य सूर्योदय के उदय होने वाली तिथि में करनी चाहिए।

यदि प्रतिपदा के दिन चित्रा नक्षत और वैधृति योग हो, तो उस स्थिति में उपर्युक्त दोनो के तीन चरण त्यागकर कलश स्थापन करना चाहिए।परन्तु प्रचलित प्रथा यह है कि प्रतिपदा को चित्रा वैधृति होने पर अभिजित मुहुर्त में कलश स्थापन करना चाहिए। यह भी कहा गया है कि -"न रात्रौ स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम्।"-रात्रि मे कलश स्थापन नही करना चाहिए अंर विसर्जन के बाद कलश के जल से यजमान का अभिषेक भी नही करना चाहिए।

यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या अशौच मे पूजा किया जाय या नही।इसके लिए कई मत है। कुछ लोगों का कथन है कि अशौच की स्थिति में पूजन वर्जित है परन्तु विश्वरूपा निबन्ध का कथन है कि देवी के उद्देश्य से अशौच में भी पूजन कर्म और दान करना चाहिए, इसमें कोई दोष नही है।-"सूतके पूजनं प्रोक्तं दानं चैव विशेषतः। देवीमुद्दिश्य कर्तव्यं तत्र दोषो न विद्यते।।"-यहाॅ पर भट्टोजिदीक्षित का वचन है कि ऐसी स्थिति मे ब्राह्मण के द्वारा नवरात्र का समस्त कार्य करवाये। यदि पूजन आरम्भ कर दिया गया अथवा आरम्भ न किया गया हो, इस स्थिति में अशौच हो जाय, तो ब्राह्मण द्वारा ही सम्पन्न पूजन कार्य कराये। किन्तु ब्राह्मण भोजन अशौच के बाद स्वयं ही करावें। इसी प्रकार स्त्रियों के रजोदोष के विषय मे भी यही लिखा है।

लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति भी हो जाती है कि प्रथम दिन थोड़ा अमावस्या रहने के बाद उसी दिन प्रतिपदा भी, द्वितीय दिन सूर्योदय के पहले ही समाप्त हो जाती है। अर्थात प्रतिपदा का क्षय हो जाता है।अमावस्या और प्रतिपदा दोनो ही उसी दिन समाप्त हो जाता है और दूसरे दिन सूर्योदय के समय द्वितीया तिथि रहती है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाय। इसके विषय में धर्मशास्त्र का कथन है कि अमावस्या से युक्त तिथि मे ही नवरात्र प्रारम्भ कर दिया जाय-

"पर दिने प्रतिपदोऽसत्त्वे अमायुक्तापि ग्राह्या"

महाष्टमी व्रत

यह 13 सितम्बर दिन बुधवार को है। इस दिन सूर्योदय 6:14 बजे पर और अष्टमी तिथि रात्रि 11 बजकर 42 मिनट तक है। इसके पश्चात नवमी तिथि है। सूर्योदय के समय अष्टमी और नवम तिथि से समन्वित होने से महाष्टमी के लिए यही तिथि ग्राह्य रहेगा।-"व्रतोपवासनियमे घटिकैकापि वा भवेत्। सा तिथिस्तदिने पूज्या विपरीता तु पैतृके।।"-व्रत-उपवास में एक घड़ी भी जो तिथि हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए, किन्तु पितृकार्य में इसके विपरीत होता है। अर्थात प्रातःकाल में अन्य तिथि हो एवं श्राद्धकाल में यदि पितृतिथि मिल जाय तो उसी मे पितृकार्य होता है। यह भी कहा गया है कि--" शरन्महाष्टमी पूज्या नवमीसंयुता सदा। सप्तमी संयुक्ता नित्यं शोक सन्ताप कारिणी।"-ऐसा मदन रत्नाकर का वाक्य है कि सप्तमी से युक्त अष्टमी अग्राह्य है। एक कला मात्र सप्तमी के बाद यदि अष्टमी हो तो उसे शल्य कहते हैं।सप्तमी युक्त अष्टमी शोक एवं सन्ताप को देने वाली है।

पौराणिक कथन है कि जम्भ नामक राक्षस ने सप्तमी युक्त अष्टमी में भगवती दुर्गा की पूजा की थी,अतः इन्द्र ने उस दानव को सप्तमी के दिन अष्टमी तिथि के दिन वध कर दिया था।अतः कल्याण चाहने वाले मनुष्य को सप्तमी युक्त अष्टमी नही रहनी चाहिए।

इस वर्ष 12 सितम्बर को (मंगलवार को) सूर्योदय 6 बजकर 14 मिनट और सप्तमी तिथि सम्पूर्ण दिन और रात्रि को एक एक बजकर 49 मिनट तक होने से बलिदानादिक कार्य इस दिन नही होंगे। इसके लिए द्वितीय दिन 13 सितम्बर ही ग्राह्य रहेगा।--परन्तु सप्तमी और मूल नक्षत्र का योग होने से पाण्डालों मे मूर्तियो के स्थापन का कार्य इसी दिन होगा। इस दिन मूल नक्षत्र सायंकाल 4 बजकर 15 मिनट तक है।-"मूले देवी स्थापयेत श्रवणे विसर्जन च।"-

नवरात्र व्रत के अनुष्ठान में यदि प्रतिपदा अमावस्यायुक्त हो, तो वह नही करना चाहिए। द्वितीया युक्त अमावस्या ही इसके लिए प्रशस्त है।दूसरे दिन यदि प्रतिपदा एक मुहुर्त (लगभग सूर्योदय के बाद 48 मिनट) भी हो,तो उस दिन से नवरात्र का व्रत करना श्रेष्ठ रहता है-"पूर्वविद्धा तु या शुक्ला भवेत् प्रतिपदाश्विनी। नवरात्र-व्रतं तस्यां न कार्यं शुभमिच्छता।।"-अमावस्या विद्धा प्रतिपदा तिथि में नवरात्र का व्रत आरम्भ करने से अनेक प्रकार के अमंगल होते हैं। इस व्रत में प्रतिपदा को घटस्थापन करके प्रातः देवी का आवाहन और पूजन करना चाहिए।

लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब सूर्योदय के समय सप्तमी होती है पश्चात अष्टमी औ, द्वितीय दिन अष्टमी न रहती हो, तो ऐसि स्थिति में सप्तमी युक्त अष्टमी को ग्राह्य माना गया है। महर्षि जाबालि का कथश है--

"यदा सूर्योदय न स्यादष्टमी च परेऽहनि।तदाष्टमी प्रकुर्वीत सप्तमी सहितां नृप।।"-

14 अक्टूबर दिन गुरूवार को सूर्योदय 6 बजकर 15 मिनट पर और नवमी तिथि रात्रि 9 बजकर 53 मिनट तक है। इसलिए नवमी पर्याप्त ( यावत दिन) होने से महानवमी व्रत के लिए पूर्ण प्रशस्त रहेगा। इस दिन माॅ दुर्गा जी के पूजन-अर्चन के लिए सूर्योदय से आरम्भ कर रात्रि 9 बजकर 53 मिनट का समय उत्तम है।

पाण्डालों में मूर्ति की स्थापना प्रातः 6 बजकर 14 मिनट से सायंकाल 4 बजकर 15 मिनट तक ग्राह्य रहेगा।

कलश स्थापन कब करें--सूर्योदय 6 बजकर 10 मिनट पर और प्रतिपदा तिथि दिन मे 3 बजकर 28 मिनट तक है। अतः सूर्योदय से प्रतिपदा पर्यन्त 3 बजकर 28 मिनट के अन्दर कभी भी कलश स्थापन किया जा सकता है। इसके लिए प्रातः 6 बजकर 10 मिनट से-- 6 बजकर 40 मिनट तक( कन्या लग्न--स्वभाव लग्न में)। --पुनः 11 बजकर 14 मिनट से दिन में एक (1) बजकर 19 मिनट तक (धनु लग्न-द्विस्भाव लग्न)। इसके अतिरिक्त अभिजित मुहुर्त (दिन में -दोपहर को 11 बजकर 36 मिनट से-12 बजकर 24 मिनट तक)। ये तीनो मुहुर्त ज्यादा प्रशस्त हैं।

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