भगवान की भक्ति में ही सबका का कल्याण है : स्वामी गोविंददेव

गोरखपुर। द्वितीय दिवस मंगलवार को लच्छीपुर स्थित साकेतनगर में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराते हुए पूज्य स्वामीजी ने बताया कि...

नैमिषारण्य के पुण्यस्थली में भागवतजी की कथा में आने वाले बहुत सारे मुनियों के साथ ही सौनक आदि ऋषियों ने महात्मा सूत जी से बहुत से प्रश्न किये। तब सूत जी ने सद्गुरु का ध्यान करते हुए प्रसन्न होकर कहा... है मुनिजनों... है श्रेष्ठजनों.. आपने बहुत ही सुंदर प्रश्न पूछे हैं। इसमें जगत का कल्याण छिपा हुआ है.. औऱ एक एक प्रश्न का उत्तर महात्मा सूत जी ने दिये...

1:- जीव का परम कल्याण किसमें है??

उत्तर-: भगवान की भक्ति प्राप्त करने में ही जीव का कल्याण है।

2:- शास्त्रों का सार क्या है?

उत्तर;- समस्त शास्त्रों का सर भगवान की भक्ति है भगवान ने गीता में भी सभी शास्त्रों का सार एक श्लोक में बताया।

3:- भगवान अवतार क्यों लेते हैं ?

उत्तर:- अपने प्रेमी भक्तों को रसास्वादन कराने के लिए जैसे शबरी जैसे भक्तों को तृप्त करने उसके भक्ति के लिए भगवान आते हैं..

( प्रश्न उठता है क्या भगवान के पास शक्ति का अभाव है क्या उन्हें विभिन्न रूपों में आकर ही दायित्वों का वध करना आवश्यक है नहीं ऐसा नहीं है श्री भगवान तो बैकुंठ में निवास करते करते अपनी लीला के माध्यम से ही नाना प्रकार के चाहे वह रावण है चाहे वह और कोई भी दैत्य है उसका वध कर सकते हैं रावण का खर दूषण का समापन कर सकते हैं किंतु तमाम भक्तों को किस प्रकार से जैसे शबरी ने प्रतीक्षा की थी राम आएंगे अहिल्या का उद्धार करना था जैसे गोपियों के लिए.. नाना प्रकार से अपने भक्तों पर दया करने, कृपा बरसाने, उनका उद्धार करने, के उद्देश्य से अवतार लिये।)

(शबरी की राम के प्रति प्रतीक्षा के प्रसंग पर चर्चा करते हुए पूज्य महाराज श्री ने जनमानस को एक संदेश दिया कि जो भी भक्त नित्य प्रति बिना कोई नागा किए भगवान के प्रतीक्षा करता है भगवान भी आकर ऐसे भक्तों जीवन भर के लिए तार देते हैं यही नहीं शबरी के सामने जिस तरह भगवान आकर बैठे ऐसे ही अपने भक्तों के सामने भगवान आकर विराज जाते हैं)

4:- भगवान के कितने अवतार हैं ?

उत्तर:- अवतारों की रूपरेखा में भगवान के अनंत अवतार हैं।

5:- भगवान क्या करते हैं ?

उत्तर:- भगवान का काम है निर्माण करना चलाना और समाप्त करना और यही भगवान करते हैं।

6:- धर्म अंत में किसकी शरण में गया ?

 भागवतेस्थिता यानी धर्म भागवत जी के शरण में गया क्योंकि भगवान ने स्वयं कहा है कि मैं भागवत में प्रवेश करूँगा।

भागवत क्या है?

सूत जी ने कहा कि भगवान ने जो ज्ञान ब्रह्मा जी को और ब्रह्माजी द्वारा नारद जी और नारद जी द्वारा भगवान व्यास जी को दिया और व्यास जी ने जिसकी रचना की वहीं श्रीमद् भागवत ग्रंथ है।

इसके बाद मुनियों को जिज्ञासा के कारण महात्मा सूत जी ने सभी को भागवत जी का सार समझाया कथा केवल श्रोता का ही भाग्य नहीं है, वह सदसौभाग्य है।

द्वापर में पाराशर मुनि के कारण भगवान वेदव्यास जी का अवतार हुआ भगवान वेदव्यास जी ज्ञान कला के अवतार हैं।

इस कारण उन्हें पता है कि कलयुग में मनुष्य की अकल क्या होगी...

भगवान वेदव्यास जी 17 पुराण कथा महाभारत ग्रंथ की रचना और भक्ति के लिए श्रीमद् भागवत ग्रंथ की रचना की यह अंतिम ग्रंथ नारद जी व्यास जी को अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं कि कैसे मेरा पतन हुआ और इसके बाद में मृत्यु लोक में गया वहां एक ऋषि के वहां मेरा जन्म हुआ और एक प्रवचन के माध्यम से मेरा जीवन बदल गया और आज मैं भगवान के भक्ति में जीता हूं यह किसी संत के प्रवचन के कारण और आज मैं भगवान के कितने पास हूं और भक्ति प्रचार करता सारे सृष्टि में घूमता हूं आप भी इसी प्रकार भक्ति के लिए ग्रँथ की रचना कीजिए।

श्रोताओं को कथा के बीच महाराजजी ने कहा कि चिंतन आप अपने व अपने घर से ही कर लीजिए... अपने दादाजी का आहार क्या था.. और आज अपना क्या है.. वो एक साथ लगभग 10 - 12 लड्डू भी खाकर स्वस्थ रह लेते थे.. कितने दूर तक पैदल चल लेते थे.. हर घर मे 15-20 लोगों का एक साथ भोजन बनना एक आम बात थी.. 10 -12 बच्चों को जन्म देने के बाद भी महिलाएं स्वस्थ रहती थी... कथा श्रवण / पूजा पाठ भी जमीन पर बैठकर करती थीं.. किन्तु आज....

क्या आज जो हो रहा है , ये ही विकास है?? आज बिना कैलकुलेटर के लोगों की बुद्धि भी नहीं चलती। इसलिए भगवान वेदव्यास जी ने ऐसी सोच से व्यक्ति की स्मृति को समापन से बचाने के सम्भावना से इस ग्रंथ की रचना की। सुविधा बढ़ने से व्यक्ति के अंदर की/ स्वयं की शक्ति का नाश हो जाता हैं।

आगे स्वामी जी ने नारद जी द्वारा सारा वृत्तांत कहने पर वेदव्यास जी ने सरस्वती नदी के उत्तर तट पर स्थित शमयाप्राश आश्रम में श्रीमद्भागवत की रचना की।

जिस समय श्रीमद् भागवत जी की रचना हो रही थी तब एक आनंद की सूचना प्राप्त हुई कि उनके घर में एक बालक का जन्म हुआ है वह आगे चलकर सुकदेव जी के नाम से जाने गए । वह तो जन्म होते ही घर छोड़कर वन को चले गए वह तो ज्ञानी थे परंतु कुछ समय बाद वे वापस लौट आए क्योंकि वेदव्यास जी ने अपने शिष्यों को भागवत के कुछ श्लोक सिखाएं थे वह शिष्य जंगल समिधा प्राप्त करने गए और उन्हीं श्लोकों का उच्चारण करने लगे यह सुनकर ध्यान में मग्न सुकदेव जी का ध्यान टूट गया क्योंकि श्लोक के माध्यम से सुकदेव जी को भगवान कृष्ण के दर्शन होने लगे वे उठे और जहां से यह श्लोक सुनाई दे रहे थे वहां आए उन्होंने उन शिष्यों से पूछ कर यह आपको श्लोक किसने सिखाएं तो उन्होंने वेदव्यास जी का नाम बताया यह सुनकर वह दौड़े-दौड़े व्यास जी के पास आए और उन्होंने पिता जी को प्रणाम कर भागवत सिखाने की प्रार्थना की भगवती का ज्ञान प्राप्त कर सुकदेव जी वहां से पुनः वनके लिए चले गए आगे वही सुखदेव जी राजा परीक्षित का उद्धार करने गंगा तट पर वन से चले आए थे। राजा परीक्षित उनकी पत्नी का नाम इरावती उनके प्रथम पुत्र का नाम जन्मेजय। इतना पूण्य करने के बाद भीएक घटना होती है, उनके यज्ञ में स्वयं भगवान देवता आते परंतु एक घटना और हो गई कि लोगों में कली (कलियुग) का प्रवेश हो गया। उसका बंदोबस्त करने राजा परीक्षित वन पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक गाय पृथ्वी का रूप लेजर खड़ी है, और एक वृषभ जो कि धर्म के रूप में है, उनकी आपस मे चर्चा चल रहीं है, उसी समय एक काला कलूटा व्यक्ति धर्मपर लातों से प्रहार करता है। ये देख राजा समझ गए कि ये कलियुग है, राजा ने खड्ग से उसपर प्रहार करने की चेष्ठा की, वह व्यक्ति (कलियुग) राजा के शरण आकर जीवन की भिक्षा मांगता है, और कुछ स्थान मांगता है। 

उसका पहला स्थान द्यूत (जुआ) दूसरा स्थान मदिरा (शराब) तीसरा स्थान पर स्त्री की लालसा, चौथा स्थान.. हिंसा पांचवा स्थान -- अधिकतम संम्पत्ति.... जिसे देकर राजा परीक्षित पुनः राज्य में वापस चले आते हैं, लेकिन कुछ समय का स्पर्श, राजा की बुद्धि को भ्रमित कर देता है, जिससे राजा के बुद्धि से रिषि (शमीक मुनि) का अपमान होता है। ये बात मुनीपुत्र को पता चलने पर उनके द्वारा राजा परीक्षित को तक्षचक सर्प द्वारा दौंश होने से सातवें दिवस मृत्यु हो जायेगा। इस सूचना को पाकर राजा परीक्षित गंगा जी के तट पर आकर भगवान से प्रार्थना करते हैं।इसीबीच शुकदेव जी का वहां आगमन होता है। राजा परीक्षित द्वारा उनके चरणों मे प्रार्थना करने पर शुकदेव जी के द्वारा श्रीमद्भागवत जी के द्वारा कल्याण का उपदेश प्रारम्भ होता है।

अन्ते नारायण स्मृति....श्लोक का गायन कर शुकदेव जी द्वारा उपदेश प्रारम्भ होता है।

शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को कहते हुए कहा है कि राजन तुम्हारे प्रश्न में जगत एवम मानव जाति का कल्याण छुपा है।

कथा के प्रारंभ में श्री रोशन खेतान श्री सुरेंद्र अग्रवाल श्री माधव जालान श्री दिनेश सिंघानिया श्री देवकीनंदन जी अग्रवाल श्री गोपाल खेमका श्री अजय मोदी श्री हरि जालान एवं सुशील जी (थर्ड मऊ से पधारे) आदि लोगों ने महाराज श्री का माल्यार्पण किया कार्यक्रम का संचालन अजय पोद्दार मीडिया प्रभारी के द्वारा किया गया।

यह कथा मातनहेलिया परिवार एवम साकेतनगर हाउसिंग सोसायटी, लच्छीपुर के तत्वावधान में *परमपूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज* (कोषाध्यक्ष- श्री रामजन्मभूमि तीर्थ न्यास, अयोध्या) जी के श्री मुख से प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से 6.30 बजे तक होगी।


*कथा स्थल - साकेत नगर, गोरखपुर

दिनाँक- 25 से 31 अक्टूबर तक

समय - प्रतिदिन अपराह्न 3 से 6.30 बजे

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