देवी सूक्त पाठ से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति

 आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र,


देवी सूक्त पाठ विधि

दुर्गा सप्तशती में पंचम अध्याय के मन्त्र संख्या 9 से 82 तक (नमो देव्यै महादेव्यै से- सर्वापदो भक्ति विनम्र मूर्तिभिः) तक देवी सूक्त है। अभीष्ट सम्पुट का प्रथम मन्त्र और इसके पश्चात प्रत्येक मन्त्र के बाद दो- दो बार सम्पुट मन्त्र का पाठ करें तथा अन्तिम मन्त्र के पश्चात केवल एक ही बार संपुट का पाठ करें। इस प्रकार सम्पुट सहित देवी सूक्त का पाठ होता है। पाठ आरम्भ करने से पूर्व शिखाबंधन, आचमन, प्राणायाम पवित्रीकरण, संक्षिप्त गणेश, षोडश मातृका, नवग्रह, त्रिदेव शक्ति का मन्त्र से पूजन करके पाठ करें ।अन्त में जप निवेदन क्षमा एवं प्रार्थना करें। समयाभाव के कारण गणपति सम्पुट दुर्गा पाठ करना सम्भव नहीं हो, तो नौ दिनों में पाठ्यक्रम इस प्रकार है। 


प्रथम दिन कवच एवं अर्गला, 

द्वितीय दिन- कीलक रात्रिसूक्त एवं देवी अथर्वशीर्ष,

तृतीय दिन- नवार्ण विधि और प्रथम चरित्र, 

चतुर्थ दिन- द्वितीय अध्याय से चतुर्थ अध्याय तक (मध्यम चरित्र), 

पंचम दिन -पंचम अध्याय से त्रयोदश अध्याय यो यो 10 अध्याय तक( उत्तर चरित्र) एवं नवार्ण जप। उत्तर चरित्र का विभाजन आधा चरित्र का पाठ नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से जपछिद्र हो जाता है। विधान को ध्यान में रखकर ही किया गया है।

षष्ठ दिन-- प्राधान्य रहस्य, वैकृतिक रहस्य और मूर्ति रहस्य का पाठ। 

सप्तम दिन- दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र एवं दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला। 

अष्टम दिन- सिद्ध कुंजिकास्त्रोत पाठ, एवं नवम दिन -देवी सूक्त से हवन एवं क्षमा प्रार्थना।

दुर्गा सप्तशती पाठ की विधि

कामना विशेष के अनुसार कई प्रकार से मां दुर्गा के पाठ किए जाते हैं। छोटे पाठ के लिए जहां संक्षिप्त पाठ किया जाता है, वही बड़े कार्य की सिद्धि के लिए सम्पुट सहित दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की विधि भी प्रचलित है। संक्षिप्त पाठ करने में अधिकतम समय 3 मिनट लगता है, तो सम्पुट सहित पाठ करने में लगभग साढ़े तीन घण्टे लगते हैं। 

साधक अपनी कामना के आकार- प्रकार तथा प्रतिदिन उपलब्ध समय के आधार पर दुर्गा पाठ की विधि का चयन कर सकता है। 

केवल सम्पुट जप : अपनी कामना से संबंधित सम्पुट मन्त्र की साधक की सुविधा के अनुसार एक माला प्रातः अथवा सायंकाल अथवा दो समय जब किए जाते हैं।

सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ विधि

इस विधि में दुर्गा सप्तशती के देवी कृपा से सम्बन्धित सात श्लोक का पाठ किया जाता है। दो अन्य मन्त्र एवं विनियोग मिलाकर इस विधा का सम्पूर्ण रूप बनता है। कामना के अनुसार चयनित सम्पुट की एक माला का जप सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ के पूर्व तथा पश्चात किया जाता है।

कन्या भोजन विधान

माता दुर्गा होम, दान और जप से उतनी प्रसन्न नही होती है, जितनी कन्या भोजन से। "न तथा तुष्यते शक्र होमदान जपेन च। कुमारी भोजनेनात्र यथा देवी।।"


नवरात्र में कन्या की संख्या के अनुसार कन्या भोजन के फल

1-सुख समृद्धि

2-संसाधन वृद्धि

3-सन्तान सुख

4-अधिकार प्राप्ति

5- विद्याधिकार

6- षट्कर्म सिद्धि

7- प्रशासनिक अधिकार

8- सर्वविधि सुख प्राप्ति

9- सर्वाधिकार सम्पन्नता।

अवस्था के आधार पर कन्याओ का नाम और नामानुसार ही उनका फल। दो से दस वर्ष तक की कन्या की पूजा की जाए।(द्विवर्षाधिका दशाब्दान्ता कुमारी पूजयेत्)।

आयु के अनुसार कन्या का नाम 

दो वर्ष= कुमारी

तीन वर्ष= त्रिमूर्तिनी

चार वर्ष= कल्याणी

पाॅच वर्ष= रोहिणी

छह वर्ष=काली

सात वर्ष= चण्डिका

आठ वर्ष= शाम्भवी

नौ वर्ष= दुर्गा 

दस वर्ष= सुभद्रा (दस वर्ष से अधिक कन्या का पूजन निषिद्ध माना गया है)। कन्या भोजन में सभी वर्णों की कन्याओं का समावेश होना चाहिए। प्रत्येक वर्ण का विशेष फल है।नवरात्र शक्ति उपासना का अनुष्ठान है।शक्तिमान करने के लिए शक्ति उपासना आधारभूत कारण है।

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

कामना विशेष के अनुसार कई प्रकार से मां दुर्गा के पाठ किए जाते हैं। छोटे पाठ के लिए जहां संक्षिप्त पाठ किया जाता है, वही बड़े कार्य की सिद्धि के लिए सम्पुट सहित दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की विधि भी प्रचलित है। संक्षिप्त पाठ करने में अधिकतम समय 3 मिनट लगता है, तो सम्पुट सहित पाठ करने में लगभग साढ़े तीन घण्टे लगते हैं। 

साधक अपनी कामना के आकार- प्रकार तथा प्रतिदिन उपलब्ध समय के आधार पर दुर्गा पाठ की विधि का चयन कर सकता है। 

केवल सम्पुट जप : अपनी कामना से संबंधित सम्पुट मन्त्र की साधक की सुविधा के अनुसार एक माला प्रातः अथवा सायंकाल अथवा दो समय जब किए जाते हैं।

सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ विधि

इस विधि में दुर्गा सप्तशती के देवी कृपा से सम्बन्धित सात श्लोक का पाठ किया जाता है। दो अन्य मन्त्र एवं विनियोग मिलाकर इस विधा का सम्पूर्ण रूप बनता है। कामना के अनुसार चयनित सम्पुट की एक माला का जप सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ के पूर्व तथा पश्चात किया जाता है।

देवी सूक्त पाठ विधि

दुर्गा सप्तशती में पंचम अध्याय के मन्त्र संख्या 9 से 82 तक (नमो देव्यै महादेव्यै से- सर्वापदो भक्ति विनम्र मूर्तिभिः) तक देवी सूक्त है। अभीष्ट सम्पुट का प्रथम मन्त्र और इसके पश्चात प्रत्येक मन्त्र के बाद दो- दो बार सम्पुट मन्त्र का पाठ करें तथा अन्तिम मन्त्र के पश्चात केवल एक ही बार संपुट का पाठ करें। इस प्रकार सम्पुट सहित देवी सूक्त का पाठ होता है। पाठ आरम्भ करने से पूर्व शिखाबंधन, आचमन, प्राणायाम पवित्रीकरण, संक्षिप्त गणेश, षोडश मातृका, नवग्रह, त्रिदेव शक्ति का मन्त्र से पूजन करके पाठ करें ।अन्त में जप निवेदन क्षमा एवं प्रार्थना करें।समयाभाव के कारण गणपति सम्पुट दुर्गा पाठ करना सम्भव नहीं हो, तो नौ दिनों में पाठ्यक्रम इस प्रकार है। 

प्रथम दिन कवच एवं अर्गला, 

द्वितीय दिन- कीलक रात्रिसूक्त एवं देवी अथर्वशीर्ष,

तृतीय दिन- नवार्ण विधि और प्रथम चरित्र, 

चतुर्थ दिन- द्वितीय अध्याय से चतुर्थ अध्याय तक (मध्यम चरित्र), 

पंचम दिन -पंचम अध्याय से त्रयोदश अध्याय यो यो 10 अध्याय तक (उत्तर चरित्र) एवं नवार्ण जप। उत्तर चरित्र का विभाजन आधा चरित्र का पाठ नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से जपछिद्र हो जाता है। विधान को ध्यान में रखकर ही किया गया है।

षष्ठ दिन-- प्राधान्य रहस्य, वैकृतिक रहस्य और मूर्ति रहस्य का पाठ। 

सप्तम दिन- दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र एवं दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला। अष्टम दिन- सिद्ध कुंजिकास्त्रोत पाठ, एवं नवम दिन -देवी सूक्त से हवन एवं क्षमा प्रार्थना।

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