भगवान का मन सदा भक्तों के लिए करुणातीत होता है : कथा व्यास

गोरखपुर। लच्छीपुर स्थित साकेतनगर में मातनहेलिया परिवार और साकेतनगर हाउसिंग सोसायटी, लच्छीपुर के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस गुरुवार को परमपूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज ने निमित्त प्रहलाद चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि नरसिंह भगवान स्वयं से प्रकट होकर हिरणाकश्यप का उद्धार करते हैं। भगवान ब्रह्मा जी ने जो वरदान हिरणाकश्यप को दिए थे सभी वरदान का पालन करके भगवान नारायण ने उसका उद्धार कर दिया । भगवान का ऎसा रूप देख सभी देवता घबरा गए। तब सभी ने प्रहलादजी को इशारा किया, और तब प्रहलाद जी ने जैसे भगवान नरसिंह जी को प्रणाम किया है वैसे ही भगवान का उग्र रूप शांत हो गया। सुकदेव जी प्रहलाद जी के लिए दो उपमा देते हैं एक तो प्रह्लाद जी बालक हैं और वे महा भागवत भी हैं, प्रहलाद जी सबसे बड़े भक्त हैं। जब भगवान नरसिंहजी ने भक्त प्रहलाद से कुछ आशीर्वाद मांगने को कहा, तो प्रह्लाद जी सभी के कल्याण का वरदान मांगते हैं। प्रह्लाद जी ने भगवान नरसिंह जी से अपने पिता के लिए भी सदगति की प्रार्थना की। भगवान का मन सभी के लिए करुणातीत होता है, वह सभी का कल्याण चाहते हैं।.... आगे स्वामी जी ने भागवत में *गजेंद्र मोक्ष*... की कथा सुनाते हुए कहते हैं कि कैसे एक बलवान हाथी जो बहुत बलवान होते हुए भी केवल एक ग्राह (मगरमच्छ) से हार जाता है। वृतांत की चर्चा करते हुए महाराज जी ने बोला कि हाथियों का एक झुंड जल क्रीड़ा करने के दृष्टिकोण से जल में रमण कर रहा था। तभी अचानक एक मगर ने एक बलवान हाथी (गजेंद्र) को पकड़कर जल में खींचना प्रारंभ कर दिया। 

उस गजेंद्र रूपी हाथी ने बहुत बल लगाया परंतु उस ग्राह के सामने उसका बल नहीं चला, और जब वह हार गया, निराश हो गया तब वह प्रभु की शरण में जाने का विचार कर, अंत में भगवान को पुकारता है। करुणातीत भगवान का स्मरण करता है। और वो भगवान से कहते हैं भगवान मैंने तो आप को पुकारा है अगर आप नहीं आए तो आपका नाम खराब होगा। बस आपके नाम के लिए पधारो। अंत में जीव जब भगवान से विधिपूर्वक प्रार्थना करता है तब भगवान को उसे बचाने के लिए आना ही पड़ता है। गजेंद्र को पूर्व जन्म का स्मरण होता है और जीव रूपी गजेंद्र को भगवान से प्रार्थना करनी पड़ती है और भगवान को जीव का कल्याण करने आना पड़ता है। भगवान कहते हैं मैं जीव सुरुचि हूं। 

आगे स्वामी जी कथा का विस्तार करते हुए *अमृत मंथन*... की कथा का श्रवण कराते हुए बताते हैं कि देव और दैत्य में नित्यप्रायः युद्ध होता रहा। देवों का हर समय नुकसान होता रहा। असुरों में दैत्य गुरु शुक्राचार्य उन्हें बचाते रहे, परंतु देवताओं के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं। इसे देख अमृत मंथन का संयोग संयोग बना और बासुकी रूपी सर्प की रस्सी बनाई गई और मेरु पर्वत को रवि बनाकर मंथन का कार्य प्रारंभ हुआ। परंतु इसमें सबसे पहले हलाहल जहर निकला जिसे भगवान शिव ने देवों की प्रार्थना पर उस विश का पान किया। इसलिए देव रहे शिवजी जगत का कल्याण करने वाले भगवान शिव महादेव बने। पुनः मंथन शुरू हुआ और अमृत निकला इसे दैत्य छीन कर ले जाने लगे। तब भगवान नारायण ने मोहिनी का रूप धारण कर दैत्यों/ असुरों को मोहित किया। उनसे अमृत कलश वापस लेने का कार्य संपादित हुआ। और देवों का कल्याण किया। अमृत मंथन के समय अनेक- अनेक रत्न निकलते हैं। अप्सराएं निकलती हैं और लक्ष्मी जी भी मंथन में सागर से प्राप्त होती हैं जिनका विवाह भगवान श्री नारायण से होता है इसी बीच देव और दैत्यों में युद्ध होता है। दैत्यों के राजा बलि मारे जाते हैं, तो दैत्यों ने उनका शरीर एक गुफा में लेजाकर छुपा देते हैं जिन्हें बाद में दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने वापस जीवित कर दिया और उन्हें बल देकर और मंत्र अनुष्ठानों से पुनः राजा बनाया, समृद्ध बनाया। राजा बलि द्वारा विश्वजीत यज्ञ करवाया गया बलि ने स्वर्ग पर आक्रमण किया और बलि स्वर्ग पर राज करते हैं ।

देव हारकर भगवान से प्रार्थना करते हैं यह देख भगवान नारायण ब्राह्मण बटुक का रूप धारण कर बामन स्वरूप में अवतार लेकर बली के राज में, यज्ञ में जाकर भिक्षा की मांग करते हैं। भिक्षा में तीन पग जमीन की मांग करते हैं और बलि के द्वारा संकल्प ले लेने के बाद बामन जी ने अपना विराट रूप धारण कर तीन लोकों को तीन चरण में लेकर राजा बलि को पाताल लोक भेजकर देव लोक का कल्याण करते हैं।

श्री कृष्ण जन्मोत्सव के प्रसंग व झांकी आदि के उपरांत आज की कथा का विश्राम हुआ।

कथा के पूर्व अंशुल गुप्ता, दुर्गेश बजाज, अंकित गोयल, महेंद्र बेरीवाल, सुरेश बेरीवाल, श्याम सुंदर शर्मा, अशोक जालान, विष्णु गोयनका, तथा मणिपुर से पधारे बासुदेव सिंह व कृष्ण कुमार आदि लोगों ने महाराज श्री का माल्यार्पण कर आशीर्वाद लिया। महाराज जी ने मंच पर मणिपुर से पधारे बासुदेव सिंह व कृष्ण कुमार का सम्मान अंग वस्त्र ओढ़ाकर सम्मान किया।

संचालन अजय पोद्दार ने किया।

यह कथा (कोषाध्यक्ष- श्री रामजन्मभूमि तीर्थ न्यास, अयोध्या) जी के श्री मुख से 31 अक्टूबर तक प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से 6.30 बजे तक होगी।

Comments