आज शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में होगी अमृत की वर्षा और आरोग्यता प्रदान

अत्यन्त पुण्य, आरोग्य एवं दीर्घायु प्रदान करने वाला है शरदपूर्णिमा का व्रत 

आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र,

अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। इस वर्ष 19 अक्टूबर के दिन शरद पूर्णिमा मंगलवार को मनाई जाएगी। इससे कोजागरी और राज पूर्णिमा भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का काफी महत्व है। आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार पूर्णिमा के दिन चांद सोलह कलाओं के परिपूर्ण होता है।मान्यताओं के मुताबिक इस दिन आकाश से अमृत की वर्षा होती है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन चांद पृथ्वी के सबसे निकट होता है। पूर्णिमा के रात्रि चांद दूधिया रोशनी धरती को नहलाती है। इस सफेद उजाले के बीच पूर्णिमा मनाई जाती है।

गोरखपुर। शरदपूर्णिमा 19 अक्टूबर मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 19 मिनट और चतुदशी तिथि का मान सायंकाल 6 बजकर 41 मिनट के पश्चात प्रदोषकाल और रात्रिपर्यन्त पूर्णिमा रहने से इसी दिन शरदपूर्णिमा का पर्व होगा। वैसे पूर्णिमा दूसरे दिन 20 अक्टूबर को भी सायंकाल 7 बजकर 37 मिनट तक है। परन्तु अर्द्धरात्रि मे न होने से 19 अक्टूबर ही मान्य रहेगा।

हल्की गुलाबी सर्दी, देश में त्योहारों का माहौल, आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की निशा, आकाश में टिमटिमाते तारों के बीच पूर्णाकार चन्द्रमा और ऐसी चांदनी रात में श्रद्धालुओं के मन में माता लक्ष्मी और उनके भ्राता चन्द्रमा की कृपा बरसने का अटूट विश्वास रहता है। ऐसी होती है पतित पावनी शरद पूर्णिमा की रात। इसे कौमुदी (चांदनी) पूर्णिमा एवं भगवान श्री कृष्ण द्वारा इसी रात्रि में महारास रचाने के कारण इसे रासपूर्णिमा भी कहते हैं। इस रात में जहां चन्द्रमा अपनी पूर्ण सभी सोलह कलाओं के साथ उदित होकर अपनी किरणों से अमृत वर्षा करते हैं, वही माता लक्ष्मी संसार में भ्रमण करते हुए जागरण में भगवान का भजन कर रहे भक्तों को धन एवं संपूर्ण वैभव प्रदान करती हैं। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है। स्पष्ट है कि इस दिन व्रत एवं विधिवत पूजा अर्चना करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। अभीष्ट की प्राप्ति होती है और घर के अभाव दूर होकर समृद्धि का निवास होता है।

इस दिन देश के अधिकांश हिस्सों में ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश पर माता लक्ष्मी तथा इस इष्टदेव की प्रतिमा स्थापित कर सुंदर आभूषणों से उसका श्रृंगार कर उपवास कर, संकल्प लेकर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसके बाद चन्द्रोदय होने पर घृत के एक सौ दीपक प्रज्वलित कर रखे जाते हैं। तत्पश्चात घी मिश्रित दूध की खीर बनाकर उसे विभिन्न पात्रों में भरकर चन्द्रमा की चांदनी में रखा जाता है। रात्रि मे एक प्रहर (3 घंटे व्यतीत होने पर) खीर लक्ष्मी जी को अर्पित की जाती है। फिर भगवथ भजनों के साथ रात्रि जागरण किया जाता है। कहीं-कहीं रात्रि जागरण आरम्भ करने से पूर्व ब्राह्मणों की खीर की प्रसादी से युक्त भोजन कराया जाता है। तो कहीं खीर सम्पूर्ण रात चांदनी में रखने के पश्चात प्रातः काल वितरित की जाती है।

ऐसा माना जाता है कि मध्यरात्रि के बाद चन्द्रमा अमृत-वर्षा करते हैं।जिससे वह खीर अमृतमयी हो जाती है और दिर्घायु और आरोग्य प्रदान करती है। मिथिलांचल (बिहार) में इस पर्व को कोजागरी पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात में माता लक्ष्मी भ्रमण करती हुई बोलती हैं, कोजागर्ति-अर्थात कौन जाग रहा है उसे धन दूंगी। इसलिए इस पूर्णिमा को वहाॅ कोजागरी पूर्णिमा एवं कोजागर व्रत कहते हैं। मिथिला में इस अवसर पर घर के आंगन को साफ व शुद्ध करके बाद, चावल के आंटे के लेप से सजाया- संवारा जाता है। फिर घर की सभी देवताओं के विग्रहों को वहाॅ सजाने के बाद खीर के साथ ही पान, मखाना, फल आदि का भोग लगाकर पूजा अर्चना की जाती है। बाद में पूरी रात खीर को अमृत वर्षा से अमृतमयी होने के लिए चांदनी में रखा जाता है। वहां आंगन सजाने संवारने का कार्य नवविवाहित दम्प एवं नववधू का भाई मिलकर करते हैं। मिथिला के कुछ स्थानों पर इस दिन काली माता की पूजा आरम्भ होती हैै, जो पन्द्रह दिन तक चलती है तथा दीपावली पर महानिशा पूजा के साथ पूर्ण होती है। पश्चिम बंगाल में इस पर्व को "लोक्खी पूजा "अर्थात लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाया जाता है। गुजरात में दिन में पूजा उपवास के बाद चन्द्रोदय के समय खीर चांदनी में रख, मंदिरों और पूजा स्थलों पर गरबा डांडिया नृत्य किया जाता है और सुबह खीर के प्रसाद का वितरण करते हैं। अयोध्या में ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री राम और सीता जी शरद पूर्णिमा की रात में भ्रमण पर निकलते और खीर का भोग ग्रहण करते हैं ।कई स्थानों पर श्री भगवती महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए श्रीसूक्त, लक्ष्मी सूक्त का पाठ स्वयं करते अथवा ब्राह्मण से करवाने के पश्चात कमलगट्टा पंचमेवा हम खीर से हवन किया जाता है।

कोजागर व्रत की विशेषता

कोजागर व्रत के विषय में "कृत्य निर्णय" में कहा गया है कि निशिथ व्यापिनी पूर्णिमा को ऐरावत पर आरूढ़ हुए इन्द्र और महालक्ष्मी का पूजन कर उपवास करें और रात्रि के समय घृतपूरित और गन्ध पुष्पादि से सुपूजित एक लाख, पचास हजार, दस हजार या एक हजार अथवा एक सौ दीपक प्रज्वलित करके देवमन्दिरो, बाग-बगीचों, तुलसी-अश्वत्थ के वृक्षों, बस्ती के रास्ते, चौराहों, गली और वास भवनो की छत आदि पर रखें और प्रातःकाल होने पर स्नानादि करके इन्द्र का पूजनकर ब्राह्मणों को घी शक्कर मिली हुई खीर का भोजन कराकर वस्त्रादि की दक्षिणा और स्वर्णादि के दीप दें तो अनन्त फल मिलता है। इस दिन दीपदान करनेे से प्रभुत्व मे वृद्धि होती है।

व्रत कथा

प्राचीन काल में एक साहूकार था ।उसके दो पुत्रियां थी। वे दोनो शरद पूर्णिमा का व्रत करती थी। बड़ी पुत्री तो व्रत पूर्ण करती लेकिन छोटी पुत्री व्रत अधूरा छोड़ देती है ।दोनों कन्याओं का विवाह हुआ तो बड़ी पुत्री तो पुत्र, धन और सुख शान्ति आदि सभी प्रकार से सन्तुष्ट थी, लेकिन छोटी पुत्री के सन्तान जन्म लेते ही मर जाते थे। इसलिए वह बहुत दुःखी रहती थी। उसने पंडितों से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने इसे शरद पूर्णिमा का व्रत सविधि करने की सलाह दी। उसने ऐसा ही किया। उसके बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वह कुछ ही समय बाद मर गया। उसने बच्चे का शव एक लकड़ी की चौकी पर रखकर उस पर (बच्चे के उपर) पीला कपड़ा डाल दिया और अपनी बड़ी बहन को बुला लायी तथा उसको उस पर बैठने को कहा। बड़ी बहन जैसे ही बैठने लगी उसकी साड़ी का स्पर्श होते ही बच्चा रोने लगा। इस पर बड़ी बहन ने छोटी को डांटा कि तुम मुझे इस बच्चे पर बिठाकर इसकी हत्या करवा देती। तब छोटी बहन ने बताया कि वह तो मर चुका था तुम्हारे पूर्णिमा व्रत के पुण्य के कारण, तुम्हारी साड़ी उसके शरीर से लगते ही वह जीवित हो गया है। उसके बाद उसने नगर में शरदपूर्णिमा का व्रत करवाने का ढिंढोरा पिटवा दिया।स्पष्ट है, शरदपूर्णिमा का व्रत अत्यन्त पुण्य के साथ ही आरोग्य एवं दीर्घायु प्रदान करने वाला होता है।

Comments