आरती-पूजन के साथ कथा का विश्राम

शास्त्र भी सिखाते हैं कि जीवन में खुशियां जरूरी : स्वामी गोविंद जी देव

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता को हंसते हंसते ही अर्जुन को सुनाया था 


गोरखपुर। मातनहेलिया परिवार एवम साकेतनगर हाउसिंग सोसायटी, लच्छीपुर के तत्वावधान में साकेतनगर स्थित आयोजित श्रीमद्भागवत कथा अंतिम दिन रविवार को आरती पूजन के साथ कथा का विश्राम हुआ। सप्तम दिवस को पूज्य स्वामी गोविंद जी देव जी कथा श्रवण कराते हुए कहा कि राजन बहुत ही आनंद की बात हो गई। राजन.... सभी द्वारिका वासी, वासुदेव जी, माता देवकी आदि सोचते थे कि भगवान कृष्ण के अनुरूप कन्या कहां से मिलेगी। और राजन.... स्वरूप में क्या.. अति सुंदर पत्नी.. भगवान कृष्ण के अनुरूप... रुक्मणी के रूप में द्वारिका वासियों को मिली। राजन अब आनंद ही आनंद है। भगवान को प्रथम पुत्र होते हैं लेकिन उनका अपहरण संभरासुर करता है। इस बीच भगवान के आठ विवाह होते हैं, यह भगवान के आठ प्रमुख पटरानीयां और उसके बाद 16 हजार कन्याओं को बंदी बनाने वाला नरकासुर के कारागृह से इन कन्याओं को भगवान नरकासुर के कारागृह से मुक्त करते हैं। और उन कन्याओं के प्रार्थना करने पर भगवान इन से विवाह करके इनके शील की रक्षा करते हैं। उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं। राजन.. प्रभु के परिवार का बड़ा विस्तार हुआ। भगवान द्वारिकाधीश का स्वभाव बहुत सुंदर है। वह परिवार हंसते रहते, हंसाते रहते तथा तनाव मुक्त रहते। भगवान विनोद भी बहुत करते। एक बार प्रभु विनोद करते-करते भगवती रुकमणी जी से कहते हैं... रुक्मणी हमने विवाह बहुत जल्दी कर ली। देखो तुम्हारे में और मेरे में क्या समानता है। रुकमणी जी को लगा कि मुझसे कोई गलती हो गई। उन्होंने कहा तुम कितनी गोरी गोरी मैं कहां काला, तुम राज महल में जन्मी, मैं कारागृह में जन्मा, तुम्हारी शिक्षा मुझसे ज्यादा और मैं गांव में रहता ग्वाला, कहां हमारे तुम्हारे में समानता है... तुम्हारा बचपन महानगर में पला, हमारा गोकुल जैसे ग्रामीण में, कहां समानांतर है। अगर तुम आज भी मुझे छोड़ दो तो अनेक राजकुमार तुम से विवाह करने को तैयार हैं। यह सब सुन भगवती बहुत रोती हैं। भगवान ने बाद में उन्हें बहुत समझाया। जब भगवती रुष्ट हो गई तब भगवान ने कहा, रुकमणी मैंने तुम्हारा मजाक किया, भगवती ने पूछा क्यों किया, तब भगवान ने कहा देवी रुक्मणी मैंने तुम्हें अनेक स्वरूप में देखा परंतु तुम रोती हुई कैसी दिखती हो यह मैंने देखा ही नहीं... और तुम रोते हुए कैसे दिखती हो - कैसी लगती हो यह देखना चाहता था। इसलिए तुम्हें रुलाया। भगवान ने रुकमणी से यह विनोद किया। इस प्रसंग में भगवान का स्वभाव कैसा है यह, दिखाई पड़ता है।

भगवान ने गीता भी हंसते हंसते ही अर्जुन को सुनाई देखो हमारे शास्त्र सिखाते हैं कि जीवन में कैसे हंसते हंसते कटना चाहिए।

महाभारत कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय कितना गंभीर वातावरण था परंतु भगवान ने हंसते-हंसते युद्ध को जिताया यह स्वभाव यह भगवान का परिवार में रहते हुए प्रसन्नता से रहना चाहिए ऐसा भगवान सिखाते हैं।

एक बार भगवान ने बाणासुर को युद्ध भूमि पर ही सुला दिया। पराया धर्म का धन गलती से हमारे पास आ जावे तो आगे चलकर उसके कारण वंश कैसे समाप्त होता है यह बताया। धर्म धन से कैसे बचाना चाहिए, और इस धन का दान करने से ही हम बच सकते हैं यह बताया।

भगवान ने महाभारत में पांडवों की पक्ष लेकर कौरवों से बचाकर उन्हें विजयी बनाया और धर्म की स्थापना की। इस भूमि से सभी पापियों का नाश किया और पृथ्वी को शुद्ध किया। और भगवान सुखदेव जी से राजा परीक्षित प्रार्थना करते हैं कि आप हमें भगवान की मित्रता की कथा सुनाएं.. तब सुखदेव जी ने भगवान के ब्राह्मण मित्र सुदामा के चरित्र को सुनाया कि कैसे सुदामा .. भगवान के मित्र रहे। दोनों गुरु संदीपन के आश्रम में साथ साथ पढ़ते थे। सुदामा अति प्रामाणिक गुरु सेवा दक्ष। ऐसे मित्र से भगवान की मित्रता हुई। भगवान का अध्ययन अल्प समय में पूरा हो गया इसके बाद भगवान शिक्षा पूरी कर मथुरा आ गए। सुदामा पढ़ते रहे आगे चलकर भगवान का सुदामा से मिलन द्वारिकापुरी में होता है। उस समय सुदामा के पास कोई धन नहीं था। इस स्थिति में सुदामा जो दान में मिलता उससे अपना परिवार चलाते। पत्नी के बार बार कहने के कारण सुदामा भगवान से मिलने द्वारिका जाते हैं। द्वारिकापुरी के लोग इनके शरीर पर फटे वस्त्र को देखकर हंसते मजाक करते। लेकिन जब भगवान से यह मित्र मिलता तब भगवान ने अपने सुंदर व्यवहार से सुदामा की महानता को बढ़ाया। और लोगों को संदेश द्वारा बताया कि भगवान के मित्र केवल बड़े ही नहीं होते.. दुर्बल भी होते हैं। सुदामा कितना दानी कितना महान है, यह समाज को बताया। और बाद में अपने इतनी दो लोकों की संपत्ति देकर उन्हें अपने जैसा बना दिया। भगवान जब इतना देते हैं कि अपने समकक्ष कर देते हैं। लेकिन सुदामा ने भगवान से कुछ भी ना मांगी थी। केवल ना मांगने वाले पर भगवान कितनी कृपा करते हैं। यह भगवान ने अपने सुंदर व्यवहार के द्वारा सिखाया है। इसके बाद भगवान ने अपने मित्र उद्धव जी को सब ज्ञान देकर बद्रिका आश्रम में तप करने भेज दिया। और कहा तुम आगे चलो बाद में मैं भी वहीं आऊंगा और अपनी चरण पादुका देकर उद्धव जी को देते हैं और वो बद्रिका आश्रम में चले जाते हैं। 

नारद जी ने देखा कि भगवान अब अंतर्ध्यान होने वाले हैं यह देखकर वह द्वारिकापुरी में वासुदेव जी को निमित्त बनाकर आते हैं द्वारिका में नारद जी और वसुदेव जी ज्ञान की चर्चा करते हैं। इसी बीच अवधूतों से भगवान ने ज्ञान पाया। इस की चर्चा करके नारद जी चले जाते हैं। सारे देवता आकाश मंडल में आकर खड़े हो जाते हैं। यह देखना चाहते हैं। परंतु किसी को कोई पता नहीं चला। भगवान कहां गये। प्रभासओत में भगवान पश्चिम तट पर आकर अपने चरण पर चरण रखकर बैठ जाते हैं। इसके पहले भगवान बलभद्र जी देखते हैं भगवान अपना अंतर्ध्यान होने वाले हैं। यह देखकर बलभद्र जी शेष का रूप धारण कर पश्चिम सागर में प्रवेश करते हैं। एक व्याध आता है, उसने देखा कि एक हिरण खड़ा है लेकिन उसे पता नहीं चला। भगवान अपना दाहिना चरण बायें चरण पर रखकर बैठे। यह पर उनका सुंदर चरण हिरण के मुख के समान दिख रहा था। उसने अपना बाण छोड़ा। बाण भगवान के चरण में लगता है। ज्यादा नजदीक आता है देखता है तो क्या यह तो भगवान के चरण है। बहुत व्याकुल होता है भगवान उसे कहते हैं डरो नहीं यह मेरी ही माया है। भगवान उसे अपने पहले बैकुंठ भेजते हैं। और इसके बाद एक बिजली चमकती है और भगवान इस प्रकार में अंतर्ध्यान हो जाते हैं। किसी को कोई कुछ पता नहीं चला। भगवान कहां गए। सुखदेव जी कहते हैं राजन भगवान कहीं से आते नहीं और कहीं जाते नहीं। भगवान द्वारिका से अंतर्ध्यान हो कर कहीं गए नहीं... वह सीधे श्रीमद् भागवत जी में प्रवेश कर गये। इसी से इस ग्रंथ को भगवान का स्वरूप कहते कहते हैं। इसके बाद राजा को ज्ञान देकर श्री सुखदेव जी जहां से आए थे चले गए। इसके बाद राजा को तक्षक ने आकर दंश किया है लेकिन देखता क्या है कि राजा परीक्षित उससे पहले ही मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं।

कथा का विश्राम आरती पूजन से किया गया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

कथा के बीच पधारे राम कथा के कथावाचक रमेश भाई शुक्ल को सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन अजय पोद्दार ने किया।

इस दौरान मुख्य रूप से हरीशचंद्र पोद्दार, नारायण अजीतसरिया, संजय मातनहैलिया, सचिन अग्रवाल, हर्ष मातनहेलिया, रामाशंकर जयसवाल, देवकीनंदन अग्रवाल, विनय अग्रवाल, अनंत अग्रवाल, विश्व हिंदू परिषद के प्रचारक एवं केंद्रीय सह मंत्री गोपालजी और जगदीश जी आश्रय आदि लोग शामिल थे।

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