समाज की सलामती के लिए घाट तक लेट कर जाती हैं महामंडलेश्वर

 


गोरखपुर। कार्तिक मास में पड़ने वाला छठ पूजा की महिमा अपार है। आस्था और श्रद्धा का आलम यह है कि व्रती अपनी मनौती पूरी होने और छठ मां की कृपा प्राप्त करने के लिए घर से घाट तक पूजा-अर्चना करते हैं। इसमें जहां आम नागरिक सामान्य तरीके से पूजन करते हैं तो वहीं किन्नर अखाड़ा की महामंडलेश्वर कनकेश्वरी नंदगिरी भी 72 घंटे की व्रत रख कर कड़ी तपस्या करती हैं। वे अपने यजमानों की सलामती के लिए व्रत रखती हैं। महामंडलेश्वर विगत 12 वर्षों से लेटते हुए घाट तक जाती है। उनकी आवास से घाट की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है। छठ व्रत वैसे ही बहुत कठिन व्रत माना जाता है। 72 घंटे का निर्जल व्रत होता है। 

"नहाय खाय" से व्रत प्रारंभ हो चुका और 24 घंटे निराजल व्रत करने के बाद आज "खरना" का पूजा अर्चना की गई। जिसमें केले के पत्ते पर गन्ने की रस से बनी रासियाव (खीर) का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके उपरांत मंगलवार की सायं में डूबते सूर्य को और फिर गुरुवार की सुबह सूर्योदय को अर्घ्य देकर आरती पूजन के बाद 36 घंटे निर्जल व्रत का पारण करेंगी।


बता दें कि महामंडलेश्वर कनकेश्वरी नंदगिरी का जन्म दक्षिणी भारत के विशाखा पट्टनम में हुआ। परंतु पालन पोषण बंगाल के आसनसोल में हुआ। बंगाल में पली और बढ़ी होने के कारण बंगाली सांस्कृतिक से कुछ अधिक ही लगाव है। महामंडलेश्वर की पद की गरिमा संभालने की पूर्व इनका नाम किरण घोष था। जिसको आचार्य लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने शिक्षा दीक्षा दिलाने के बाद इनका नाम कनकेश्वरी नंदगिरी रख दी। तब से समाज में सनातन धर्म की अलख जगा रही हैं।


इसके बावजूद जहां श्रद्धालु मनौती पूरी होने के लिए व्रत रखते हैं तो वहीं कनकेश्वरी नंद गिरी समाज के उत्थान व सुख समृद्धि के लिए अपने आवास से लेट कर घाट तक जाती हैं। चार किलोमीटर की यात्रा करने के बाद उनके चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं होता है उनका मानना है कि जितनी कठिन तपस्या होगी उतनी ही अधिक छठी मैया की कृपा मिलेगी। मनौती पूरी होने पर वे 5 साल लेट कर घाट तक जाती हैं। कंकेश्वरी नंदगिरी पीपीगंज स्थित अपने आवास से पिछले 5 वर्षों से इस व्रत पर लेटकर घाट तक जाती हैं। इसके पूर्व वह अपने निवास कोलकाता में रहते हुए लगभग 12 वर्षों से व्रत रखती हैं। छठ पर्व के दिन पीपीगंज में दुर्गा मंदिर के पास स्थित सरोवर तक अपने आवास से वह लेटते हुए ढोल नगाड़ों के साथ घाट तक पहुंचती हैं। जुलूस में बैंड- बाजा के अलावा दर्जन भर किन्नर व क्षेत्र की एक बड़ा समूह में महिलाएं भी शामिल होती हैं। महामंडलेश्वर कहती हैं कि यहां का पूरा समाज और यजमान ही मेरे सब कुछ है। इसलिए उनकी सलामती के लिए मैं व्रत रखती हूं और लेटते हुए घाट तक जाने की कठिन तपस्या करती हूं ताकि छठ मैया सबका कल्याण करें। सभी सुखी रहें। करोना जैसी महामारी को भी इस देश में अपना पांव न जमा सके। इसके लिए छठी मैया से आराधना करती हूं। जो अनवरत जारी रहेगा।


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